कैसे एक गरीब रिक्शे वाले का बेटा बना एक आईएएस अफसर | सफलता की सम्पूर्ण कहानी जो एक आईएएस अफसर बनने वाले के अंदर होना जरुरी है

कैसे  IAS का  रुतबा  सबसे  अधिक  है। हर साल  लाखों परीक्षार्थी एक IAS officer बनने  की  चाह  में  Civil Services के  exam में  बैठते  हैं  पर  इनमे  से 1% से  भी  कम  लोग  IAS officer बन  पाते  हैं । आप  आसानी  से  अंदाज़ा  लगा  सकते  हैं  कि  IAS Exam को beat करना  कितना  मुश्किल  काम है , और ऐसे  में  जो  कोई  भी  इस  exam को  clear कर लेता है  उसके  लिए  मन  में  एक  अलग ही छवि  बन  जाती  है । और  जब  ऐसा  करने  वाला  किसी  बहुत  ही  साधारण  परिवार या गरीब परिवार  से  हो  तो  उसके  लिए  मन  में  और  भी  respect आना  स्वाभाविक  है।

आज  मैं  आपके  साथ  ऐसे  ही  एक  व्यक्ति की  कहानी  share  कर  रहा  हूँ  जो  हज़ारो  दिक्कतों और मुश्किलों के  बावजूद  अपने  दृढ  निश्चय  और  मेहनत  के  बल  पर  IAS officer बना । ऐसे आईएएस अफसर हमे हमारे लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक जूनून पैदा कर सकते है तो आज हम इस रियल IAS Officer की स्टोरी को अच्छे से पढ़ कर उसके दृढ़ निश्चय एवं कड़ी मेहनत को अपने जीवन में उत्तारे और एक आईएएस अफसर बनने की राह में अग्रसर हो सके|

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IAS Officer Success Story in Hindi : 
Govind Jaiswal

ये  कहानी  है  Govind Jaiswal की , इनके  पिता  एक  रिक्शा -चालक  थे , बनारस  की  तंग  गलियों  में , एक  12 by 8 के  किराए  के  कमरे  में  रहने  वाला  गोविन्द जैस्वाल  का  परिवार  बड़ी  मुश्किल  से  अपना  गुजरा  कर  पाता  था । ऊपर से  ये  कमरा  ऐसी  जगह  था  जहाँ  शोर -गुल  की कोई  कमी  नहीं  थी , अगल-बगल  मौजूद  फक्ट्रियों  के  शोर  में  एक  दूसरे  से  बात  करना  भी  मुश्किल  था।

नहाने -धोने  से  लेकर  खाने -पीने  तक  का  सारा  काम इसी  छोटी  सी जगह  में  गोविन्द जैस्वाल , माता -पिता  और  दो  बहने  करती  थीं । पर  ऐसी  परिस्थिति  में  भी  गोविन्द जैस्वाल  ने  शुरू  से  पढाई  पर  पूरा  ध्यान  दिया।

अपनी  पढाई  और  किताबों  का  खर्चा  निकालने  के  लिए  वो   class 8 से  ही  tuition पढ़ाने  लगे । बचपन  से  एक  असैक्षिक  माहौल  में  रहने  वाले  गोविन्द  को  पढाई  लिखाई   करने  पर  लोगों  के  ताने  सुनने पड़ते  थे । “ चाहे  तुम  जितना  पढ़ लो  चलाना  तो  रिक्शा  ही  है ” पर  गोविन्द  इन  सब  के  बावजूद  पढाई  में  जुटे  रहते । उनका  कहना  है-


मुझे  divert करना  असंभव था ।अगर  कोई  मुझे  demoralize करता  तो  मैं  अपनी  struggling family के  बारे  में  सोचने  लगता।

आस – पास  के  शोर  से  बचने  के  लिए  वो  अपने  कानो  में  रुई लगा  लेते , और  ऐसे  वक़्त  जब  disturbance ज्यादा  होती  तब  Maths लगाते , और  जब  कुछ  शांती  होती  तो  अन्य  subjects पढ़ते ।रात में  पढाई के लिए अक्सर उन्हें मोमबत्ती, ढेबरी, इत्यादि का सहारा लेना पड़ता क्योंकि उनके इलाके में १२-१४ घंटे बिजली कटौती रहती।

चूँकि   वो  शुरू  से  school topper रहे  थे  और  Science subjects में  काफी  तेज  थे  इसलिए   Class 12 के  बाद  कई  लोगों  ने  उन्हें  Engineering करने  की  सलाह  दी ,। उनके  मन  में  भी  एक  बार  यह विचार  आया , लेकिन  जब  पता  चला  की  Application form की  fees ही  500 रुपये  है  तो  उन्होंने  ये  idea drop कर  दिया , और  BHU से  अपनी  graduation करने  लगे , जहाँ  सिर्फ 10 रूपये की औपचारिक fees थी ।

Govind अपने  IAS अफसर बनने  के  सपने  को  साकार  करने  के  लिए  पढ़ाई  कर  रहे  थे  और  final preparation के  लिए  Delhi चले  गए  लेकिन  उसी  दौरान   उनके  पिता  के  पैरों  में  एक  गहरा  घाव  हो  गया  और  वो  बेरोजगार  हो  गए । ऐसे  में  परिवार  ने  अपनी  एक  मात्र  सम्पत्ती , एक  छोटी  सी  जमीन  को  30,000 रुपये  में  बेच  दिया  ताकि  Govind अपनी  coaching पूरी  कर  सके । और  Govind ने  भी  उन्हें  निराश  नहीं  किया , 24 साल  की  उम्र  में  अपने  पहले  ही attempt में (Year 2006)  474 सफल  candidates में  48 वाँ  स्थान  लाकर  उन्होंने  अपनी  और  अपने  परिवार  की  ज़िन्दगी  हमेशा -हमेशा  के  लिए  बदल  दी ।

कहानी का संक्षिप्त वीडियो देखे 

अंग्रेजी  का  अधिक  ज्ञान  ना  होने पर  उनका  कहना  था , “ भाषा  कोई  परेशानी  नहीं  है , बस  आत्मव्श्वास  की ज़रुरत  है । मेरी  हिंदी  में  पढने  और  व्यक्त  करने  की  क्षमता  ने  मुझे  achiever बनाया। अगर  आप  अपने  विचार  व्यक्त  करने  में  confident हैं  तो  कोई  भी  आपको  सफल  होने  से  नहीं  रोक  सकता ।कोई  भी  भाषा  inferior या  superior नहीं  होती। ये  महज  society द्वारा  बनाया  गया  एक  perception है। भाषा  सीखना  कोई  बड़ी  बात  नहीं  है – खुद  पर  भरोसा  रखो । पहले  मैं  सिर्फ  हिंदी  जानता  था, IAS academy में  मैंने  English पर  अपनी  पकड़  मजबूत  की । हमारी  दुनिया  horizontal है —ये  तो  लोगों  का  perception है  जो  इसे  vertical बनता  है , और  वो  किसी  को  inferior तो  किसी  को  superior बना  देते  हैं ।”

 गोविन्द  जी  की  यह  सफलता  दर्शाती  है  की  कितने  ही  आभाव  क्यों  ना  हो  यदि  दृढ  संकल्प  और  कड़ी मेहनत   से  कोई  अपने  लक्ष्य -प्राप्ति  में  जुट  जाए  तो  उसे  सफलता  ज़रूर  मिलती  है । आज  उन्हें  IAS officer बने  5 साल  हो  चुके  हैं  पर  उनके  संघर्ष  की  कहानी  हमेशा  हमें प्रेरित  करती  रहेगी।

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